राजीव गांधी की मौत से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ? राजनीती क्या-क्या करवाती है?
राजीव गांधी भूल गए थे कि जिस प्रकार प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्होंने अपनी माता की मृत्यु से मिलने वाली सहानुभूति का सहारा लिया उसी तरह कोई उनकी भी मृत्यु पर राजनीतिक दांव खेल सकता है. राजीव गांधी सोनिया गांधी से तो पत्नी की तरह प्यार करते थे परंतु राजनीति की चाह किसी के भी मन में आ सकती है.
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पार्टी पर राजीव गांधी का नियंत्रण था. राजीव गांधी के जीवित रहते पार्टी की बागडोर सोनिया गांधी के हाथ में कभी नहीं आने वाली थी. यह सब कुछ राजनीतिक दांवपेच के चलते राजीव गांधी के भाई को मिल सकता था. या फिर राजीव गांधी से सीधा राहुल गांधी तक आ सकता था. यानी कि कुल मिलाकर सोनिया गांधी को राजनीतिक सत्ता का संचालन करने का मौका नहीं मिलता.
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21 मई 1991 में एक सुसाइड बॉम्बर महिला ने राजीव गांधी के पास जाकर बम विस्फोट कर लिया. शायद यह राजीव गांधी के उन्हीं कर्मों का फल था जो उन्होंने 1984 में सिखों के साथ किया था.
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इसके बाद ठीक उसी प्रकार सारी सहानुभूति सोनिया गांधी को मिलने लगी जिस प्रकार इंदिरा के मरने पर राजीव गांधी को मिली थी. तथा पार्टी की बागडोर कांग्रेस के बड़े नेताओं ने सोनिया गांधी को सौंप दी. इस तरह संजय गांधी के परिवार का पूरी तरह से पत्ता साफ हो गया और सोनिया गांधी कांग्रेस की आलाकमान बन गई.
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इस प्रकार काफी लंबे समय तक सोनिया गांधी ने लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी पर शासन किया. सीधे शब्दों में कहें तो देश पर शासन किया.




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