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कौन हैं सिखों में शौर्य और साहस का प्रतीक माने जाने वाले निहंग सिख


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कौन है निहंग सिख
सिख धर्म के ग्रंथों में जो जिक्र मिलता है उसके मुताबिक, सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने वर्ष 1699 में श्री केशगढ़ साहिब में खालसा पंथ सजाया था और उस समय उन्होंने अपने पांच चहेतों को अपना बाणा और बाणी दी थी। ऐसा माना जाता है कि वही पांचों, निहंग सिख हैं। इन सिखों ने ही अभी तक उन बाणा और बाणी को संभाल के रखा गया है। इन्हें गुरु की लाड़ली फौज भी कहा जाता है। इतिहास में मुगलों और अंग्रेजों के साथ कई जंग में निहंगों की शौर्य गाथाएं मिलती हैं। अब जंग तो नहीं होती, मुंगल और अंग्रेज भी चले गए, लेकिन निहंग सिखों का शौर्य, लड़ाकापन और रसूख वैसे का वैसा ही है।
‘आए ने निहंग, बुआ खोल देओ निसंग, निहंग कहावे सो पुरख, दुख सुख मने न अंग’ यानी गुरु की इस लाड़ली फौज को समाज में वो दर्जा हासिल था कि बोला जाता था घर का दरवाजा निसंग खोल दो, डरने की बात नहीं है, निहंग आ गए हैं। निहंग सिख यानी बेहद जोशीली, सम्मानित हथियारबंद सिख कौम। जो बाणा और बाणी के आधार पर दूसरे पगड़ीधारी सिखों से थोड़ी अलग है।
इतिहास में है जिक्र
इन निहंगों का इतिहास में जिक्र किया गया है। इतिहास में मुगलों और अंग्रेजों के साथ निहंगों की जंग की कई बड़ी गाथाएं पढ़ी जा सकती है। इन गाथाओं में उनके शौर्य और साहस के बड़े किस्से सुनने को मिलते हैं. इन निहंगों को खास गुरु पर्व पर नगर कीर्तनों के दौरान देखा जा सकता है। इस दौरान नगर-नगर होते कीर्तनों में निहंग सिख करतब करते हुए दिखाई देते हैं।
बताया जाता है कि इनमें महिलाएं और बच्चे भी होते हैं जो पूर्ण पारंगत होते हैं। इनके पास पुराने हथियार होते हैं। इसके अलावा उन्हें मार्शल आर्ट में भी पारंगत हासिल होती है। इन सिखों के बारे में कहा जाता है कि ये अपना पूरा जीवन सिख धर्म में वर्णित नियमों को पूरा करने में लगा देते हैं। इन्हें कट्टर सिख भी कहा जाता है।
निहंगों का जंगी अभ्यास गतका, इनकी भाषा भी जंगी
इनका जंगी अभ्यास गतका है, जिसने दुनिया को हैरत में डाल रखा है। इस वक्त निहंगों के कई सेक्ट हैं, लेकिन मुख्य रूप से सबसे बड़ा सेक्ट बुड्ढा दल है। इसके पहले मुखी बाबा बिनोद सिंह गुरु गोबिंद सिंह के साथ अनेकों जंगों में रहे। दल के 14वें मुखी जत्थेदार बाबा बलबीर सिंह अकाली दैनिक भास्कर को बताते हैं कि 1708 में गुरु गोबिंद सिंह चमकौर साहिब, मुक्तसर, तलवंडी साबो होते हुए श्री नांदेड़ साहिब पहुंचे, जहां उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहब को गुरुआई बख्श दी।

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