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किसी ने सोचा नहीं था 40 की उम्र में देश में छा जाएगी ये पार्टी

श्रीधर अग्निहोत्री

भारतीय जनता पार्टी की स्थापना जिस समय की गई थी, उस समय सांस्कृतिक विचारधारा के लोग तो देश में खूब थे लेकिन उन्हें दिशा देने वाले कुछ मुट्ठी भर नेता ही थे। भाजपा जब अपने शैशवकाल में थी तो किसी ने कल्पना नहीं की थी कि 40 की उम्र आते आते वह केन्द्र की सत्ता के अलावा 17 राज्यों में भी सत्तासीन दल हो जाएगी।
भाजपा के सफर की बात की जाए तो उसका सफर काफी उतार चढाव वाला रहा है। राजनीति की रपटीली राहों में वह कई बार फिसलकर संभल चुकी है। मूल रूप से जनसंघ के तौर पर पहचान रखने वाली भाजपा नेहरू-इंदिरा के दौर में भी काफी अच्छी स्थिति में रहती थी, पर आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने की रणनीति लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने बनाई तो जनसंघ को भी अन्य दलों की तरफ जनता पार्टी में समाहित करना पड़ा।

जनता पार्टी के विघटन से हुआ जन्म

जनता पार्टी को सफलता भी मिली और पार्टी के सवर्मान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने, पर जनता पार्टी में शामिल विभिन्न दलों के आपसी तालमेल और विचारों में एकरूपता न होने के कारण यह दल बिखर गया। जिसके बाद पुरानी जनसंघ पार्टी का नई भारतीय जनता पार्टी के तौर पर जन्म हुआ।
छह अप्रैल 1980 को मुम्बई में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, भेरो सिंह शेखावत, राजमाता सिंधिया, डा. मुरली मनोहर जोशी, सुंदर सिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, शांताकुमार, के आर मलकानी, विजय कुमार मल्होत्रा और मदन लाल खुराना समेत अन्य कई नेताओं की उपस्थिति में पार्टी का गठन किया। जिसके पहले अध्यक्ष अटल विहारी वाजपेयी बनाए गए।

पहले चुनाव में चारों खाने चित्त

पार्टी के गठन के बाद लोकसभा का जब पहला चुनाव हुआ तो भाजपा ने भी अपने प्रत्याशी उतारे। लेकिन दुर्भाग्यवश इस वर्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षको ने हत्या कर दी जिसके बाद देश में उपजी सहानुभूति की लहर से भाजपा चारों खाने चित्त हो गयी।
भाजपा केवल दो सीटे ही जीत सकी एक हनामकोड़ा (आंध्र प्रदेश)। जहां पर भाजपा के चंदूपाटिया रेड्डी ने चुनाव जीता था। रेड्डी ने कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नरसिम्हा राव को हराया था। जबकि दूसरी सीट गुजरात के मेहसाना से जीती थी। यहां भाजपा के एके पटेल विजयी हुए थे।
भाजपा को इनती बुरी हार की उम्मीद नहीं थी। इसके बाद पार्टी के अंदर दबे स्वर में अटल के उदारवादी रूख की आलोचना होने लगी। इसके बाद पार्टी की कमान लालकृष्ण आडवाणी को सौंपी गयी। तो उन्होंने पार्टी को अपने ढंग से मांजने का काम किया।

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